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USA को क्यों करना पड़ा था प्रथम विश्वयुद्ध में प्रवेश, 6 अप्रैल 1917 को क्या हुआ कि विल्सन ने कर दिया जंग-ए-ऐलान?

 Published : Apr 06, 2026 06:00 am IST,  Updated : Apr 06, 2026 06:00 am IST

प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका आज ही के दिन 6 अप्रैल 1917 को शामिल हुआ था। हालांकि प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत 1914 से ही हो चुकी थी, लेकिन अमेरिका तटस्थ रहना चाहता था। मगर जर्मनी की कुछ हरकतों ने उसे प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने को मजबूर कर दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेते अमेरिकी सैनिक। - India TV Hindi
प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेते अमेरिकी सैनिक। Image Source : US ARMY

वाशिंगटनः प्रथम विश्व युद्ध 1914 में शुरू हुआ था, जो कि 1918 तक चला था। इस युद्ध में पहले अमेरिका शामिल नहीं था, मगर बाद में कुछ ऐसे अपरिहार्य परिस्थितियां बन गईं कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडो विल्सन को प्रथम विश्व युद्ध में कूदना पड़ गया। यह युद्ध काफी भयावह था, जिसमें लाखों लोगों की मौत हुई। आइये जानते हैं कि ऐसी कौन सी वजहें थीं, जिसने अमेरिका को प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के करीब ढाई साल बाद इसमें शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया?

6 अप्रैल 1917 को अमेरिका ने किया प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने का ऐलान

6 अप्रैल 1917 को अमेरिका ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की औपचारिक घोषणा कर दी। इससे पहले अमेरिका सख्त तटस्थता की नीति अपनाए हुए था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने 1916 के राष्ट्रपति चुनाव में “उसने हमें युद्ध से बाहर रखा” का नारा दिया था, लेकिन 1917 की शुरुआत में जर्मनी की आक्रामक नीतियों ने स्थिति पूरी तरह बदल दिया और अमेरिका को इस युद्ध में कूदना जरूरी हो गया। 

प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका के शामिल होने के मुख्य कारण

असीमित पनडुब्बी युद्ध 

जर्मनी ने 1916 में “ससेक्स वादा” किया था कि वह यात्री जहाजों और तटस्थ देशों के जहाजों पर बिना चेतावनी हमला नहीं करेगा, लेकिन जनवरी 1917 में जर्मनी ने यह वादा तोड़कर फिर असीमित पनडुब्बी युद्ध शुरू कर दिया। ऐसा करने के पीछे जर्मनी का असली उद्देश्य ब्रिटेन को भुखमरी में धकेलना और उसे जल्दी हार मानने के लिए मजबूर करना था। लिहाजा जर्मनी ने फरवरी और मार्च कई अमेरिकी व्यापारिक जहाज को समुद्र में डुबो दिया, जिसमें सैकड़ों अमेरिकी नागरिक मारे गए। इससे अमेरिकी जनता में गुस्सा भड़क उठा। तत्कालीन राष्ट्रपति विल्सन ने इसे “मानवता के खिलाफ युद्ध” बताया।

जिमरमैन का टेलीग्राम बम

जनवरी 1917 में जर्मन विदेश मंत्री आर्थर जिमरमैन ने जर्मनी में मेक्सिको के राजदूत को एक गुप्त टेलीग्राम भेजा। इसमें लिखा था कि यदि अमेरिका युद्ध में शामिल होता है तो मेक्सिको जर्मनी के साथ गठबंधन करे। बदले में जर्मनी अमेरिका से छीने गए टेक्सास, न्यू मैक्सिको और एरिजोना को  मेक्सिको को लौटा देगा। ब्रिटिश खुफिया विभाग ने इस टेलीग्राम को इंटरसेप्ट कर डिकोड कर लिया। इसके बाद ब्रिटेन ने यह सूचना फरवरी 1917 में अमेरिका को भेज दी। 1 मार्च 1917 को यह खबर अमेरिकी अखबारों में छपी। इससे पूरे अमेरिका में भारी आक्रोश फैल गया। इस कारण अमेरिकियों को लगा कि जर्मनी सीधे उनके देश पर खतरा पैदा कर रहा है।

मित्र राष्ट्रों के हार का डर

युद्ध शुरू होने से ही अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अपने मित्र देशों को हथियार, गोला-बारूद और ऋण दे रहा था। अमेरिकी बैंक और कंपनियों ने मित्र राष्ट्रों को 1917 तक लगभग 2 अरब डॉलर का कर्ज दे चुके थे। ऐसे में अगर अमेरिका के मित्र राष्ट्र हार जाते तो उनका यह पैसा डूब जाता। उस दौरान जर्मनी के पनडुब्बी हमलों से अमेरिकी व्यापार भी प्रभावित हो रहा था।

जर्मनी का बढ़ता अत्याचार

जर्मनी द्वारा बेल्जियम में अत्याचारों की खबरें, इससे पहले 1915 में जर्मनी द्वारा डुबोए गए लुसिटानिया जहाज जैसी घटनाएं और जिमरमैन के टेलीग्राम ने अमेरिकी जनमत को जर्मनी के खिलाफ कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति विल्सन ने युद्ध को “लोकतंत्र को सुरक्षित बनाने का युद्ध” करार देते हुए जर्मनी के खिलाफ जंग-ए-ऐलान कर दिया और इस प्रकार अमेरिका भी प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हो गया। 

युद्ध में शामिल होने से पहले और क्या हुआ

2 अप्रैल 1917 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन ने कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। उन्होंने कहा-“हम युद्ध के पक्ष में हैं, क्योंकि दुनिया को लोकतंत्र के लिए सुरक्षित बनाना है।” उन्होंने जर्मनी की कार्रवाइयों को “मानवता के खिलाफ युद्ध” करार दिया। इसके बाद 4 अप्रैल 1917 को अमेरिकी सीनेट ने 82-6 मतों से युद्ध की घोषणा को मंजूरी दी। बाद में 6 अप्रैल 1917 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 373-50 मतों से प्रस्ताव पास किया। इसी दिन अमेरिका ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की औपचारिक घोषणा कर दी। 

युद्ध के ऐलाान के बाद क्या हुआ?

प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने के बाद अमेरिका ने तेजी से अपनी सेना तैयार की। “सिलेक्टिव सर्विस एक्ट” के तहत लाखों युवाओं को सेना में भर्ती किया गया। 1918 तक अमेरिका ने 20 लाख से ज्यादा सैनिक यूरोप भेजे। अमेरिकी सेना ने जर्मनी के अंतिम हमलों को रोका और अपने मित्र राष्ट्रों की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई। विल्सन का यह फैसला अमेरिका के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। युद्ध से पहले अमेरिका मुख्य रूप से अलग-थलग नीति अपनाये हुए था, लेकिन बाद में वह विश्व मंच पर प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा। विल्सन बाद में “14 बिंदुओं वाली” शांति योजना लेकर आए, जिससे लीग ऑफ नेशंस की नींव पड़ी। 

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